हिंदुस्तानी मुसलमान, मसाइल और हल
हिंदुस्तानी मुसलमान, मसाइल और हल

लेखक : फहीम अख्तर, लंदन
हिंदुस्तानी मुसलमान आखिर कब तक सियासी पार्टियों से उम्मीदें लगाए रखेगा? यह एक ऐसा सवाल है जो मेरे ज़हन में बार-बार गूंजता है। आज़ादी से पहले भी मुसलमानों को सियासी नारों, वादों और जज़्बातों के ज़रिए इस्तेमाल किया गया, और आज़ादी के बाद भी यही सिलसिला अलग-अलग चेहरों, अलग-अलग झंडों और अलग-अलग नारों के साथ जारी रहा। फर्क सिर्फ इतना आया कि पहले मुसलमान को डर दिखाकर इस्तेमाल किया जाता था और अब सुरक्षा का सपना दिखाकर। लेकिन नतीजा हर बार एक ही निकला—महरूमी, कमज़ोरी, ज़िल्लत और सियासी इस्तेहसाल।
मेरे नज़दीक हिंदुस्तानी मुसलमान की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि वह हर चुनाव से पहले किसी न किसी सियासी मसीहा की तलाश में लग जाता है। कभी सेक्युलरिज़्म के नाम पर वोट दिया जाता है, कभी फ़िरक़ापरस्ती के डर से, और कभी इस उम्मीद पर कि शायद इस बार कोई पार्टी मुसलमानों के तालीमी, माशी और समाजी मसाइल पर सनजीदगी से काम करेगी। लेकिन अफसोस कि हर चुनाव के बाद मुसलमान सिर्फ तकरीरों, वादों और जज़्बाती नारों के दरमियान तन्हा खड़ा रह जाता है।
सियासी जमातों ने हमेशा मुसलमानों को एक वोट बैंक के तौर पर देखा, एक ऐसी भीड़ जिसे डर, जज़्बात या मज़हबी नारों के ज़रिए आसानी से एक दिशा में धकेला जा सकता है। मुसलमानों की बस्तियों में इंतेखाबी जलसे तो बहुत हुए, मगर वहाँ स्कूल कम बने। वादे तो बेशुमार किए गए, मगर रोज़गार के मौके पैदा नहीं किए गए। हर पार्टी ने मुसलमानों के नाम पर सियासत की, लेकिन मुसलमानों की हक़ीकी तरक्की के लिए मुखलिसाना मंसूबाबंदी बहुत कम दिखाई दी।
सबसे ज़्यादा अफसोस इस बात का है कि मुसलमान खुद भी इस सियासी खेल को समझने के बावजूद खामोश रहता है। चंद नुमाइशी चेहरों, चंद टिकटों और चंद बयानों पर खुश हो जाता है, जबकि पूरी क़ौम तालीमी पसमानदगी, बेरोज़गारी, माशी कमज़ोरी और समाजी अदमे तहफ्फुज़ का शिकार रहती है। यह तलख हकीकत है कि मुसलमानों को सिर्फ इंतेखाबात के मौसम में याद किया जाता है, और फिर पाँच साल के लिए उन्हें उनके हालात पर छोड़ दिया जाता है।
मैं अक्सर सोचता हूँ कि आखिर क्यों मुसलमान अपनी असली ताक़त को भूल चुका है? एक क़ौम जो इल्म, तिजारत, तहज़ीब और करदार के ज़रिए दुनिया की क़यादत करती थी, आज सियासी जमातों के दरवाज़ों पर उम्मीदों की भीख क्यों माँग रही है? क्यों मुसलमान अपनी तालीमी तहरीक, इक़्तिसादी खुदमुख्तारी और समाजी इत्तिहाद के बजाय सियासी नारों में उलझा हुआ है?
मेरे ख्याल में मुसलमानों को अब सियासी पार्टियों के रहम-ओ-करम पर जीने की ज़हनियत बदलनी होगी। अगर क़ौम वाकई इज़्ज़त और वक़ार चाहती है तो उसे सबसे पहले तालीम को अपना हथियार बनाना होगा। हर मोहल्ले में स्कूल, लाइब्रेरी, कोचिंग सेंटर और हुनरमंदी के इदारे क़ायम करने होंगे। नौजवानों को सिर्फ जज़्बाती सियासत नहीं बल्कि साइंस, टेक्नोलॉजी, क़ानून, मीडिया और कारोबार की दुनिया में आगे बढ़ाना होगा। जब तक मुसलमान माशी और तालीमी तौर पर मज़बूत नहीं होगा, तब तक वह हर सियासी पार्टी के लिए सिर्फ एक इस्तेमाल होने वाला तबका बना रहेगा।
यह भी ज़रूरी है कि मुसलमान जज़्बाती नारों के बजाय सवाल पूछना सीखे। जो पार्टी वोट माँगने आए, उससे तालीम, रोज़गार, तहफ्फुज़ और नुमाइंदगी के बारे में अमली जवाब तलब करे। सिर्फ मज़हबी या सेक्युलर नारों पर यकीन करने के बजाय अपनी आने वाली नस्लों के मुस्तकबिल को सामने रखकर फैसला करे।
मुसलमानों की मौजूदा ज़बूं-हाली पर जब मैं सनजीदगी से ग़ौर करता हूँ तो दिल में एक अजीब सी कसक पैदा होती है। अफसोस इस बात का नहीं कि हालात खराब हैं, अफसोस इस बात का है कि हमने अपनी तबाही के असबाब खुद अपने हाथों से तैयार किए हैं। हम हर नाकामी का इल्ज़ाम दूसरों पर डालने के आदी हो चुके हैं, मगर खुद एहतेसाबी से हमेशा फरार इख्तियार करते हैं। हकीकत यह है कि आज हिंदुस्तानी मुसलमानों की बदहाली में दूसरों से ज़्यादा खुद मुसलमानों की अपनी कमज़ोरियाँ, बदअमनी, झूठ, मुनाफ़िकत, अहदों की लालच और ज़ाती मफादात शामिल हैं।
क़ौम की क़यादत ऐसे लोगों के हाथ में चली गई है जिनके नज़दीक मिल्लत की खिदमत से ज़्यादा अपनी कुर्सी, अपनी तस्वीर और अपनी सियासी दुकान अहम है। मज़हब के नाम पर जज़्बात भड़काए जाते हैं मगर तालीम, रोज़गार और फिकरी तरक्की पर बात नहीं की जाती। हमने क़ौम को नारों में उलझा दिया और नई नस्ल को अमली मैदान में तन्हा छोड़ दिया। यही वजह है कि आज मुसलमान माशी, तालीमी और समाजी तौर पर कमज़ोर होते जा रहे हैं और बहालते मजबूरी ज़लील-ओ-ख्वार ज़िंदगी गुजारने पर मजबूर हैं।
मुझे सबसे ज़्यादा मायूसी उस वक़्त हुई जब मैंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को दो तफसीली खत लिखे। उन खतों में मैंने न कोई अहदा माँगा, न कोई माली फायदा, बल्कि सिर्फ यह पेशकश की कि मैं पश्चिम बंगाल के मुसलमानों के लिए बतौर कंसल्टेंट काम करना चाहता हूँ ताकि तालीमी, समाजी और फिकरी मसाइल के हल के लिए कुछ सकारात्मक तजवीज़ पेश कर सकूँ। लेकिन अफसोस कि उन खतों का कोई जवाब तक नहीं दिया गया।
बाद में उनकी पार्टी के चंद दलालनुमा कार्यकर्ताओं ने बड़ी बेशर्मी से मुझसे कहा कि "ममता बनर्जी खत नहीं पढ़तीं, और उन तक खत पहुँचने भी नहीं दिए जाते”।
यह सुनकर मुझे हैरत नहीं हुई, सिर्फ अफसोस हुआ। शायद हमारे मुल्क में लीडरों तक अवाम की आवाज़ पहुँचने से पहले ही चापलूसों, मफादतपरस्तों और सियासी दलालों की दीवार खड़ी हो जाती है। अवाम के मसाइल से ज़्यादा अहमियत खुशामद करने वालों को दी जाती है। यह सूरत-ए-हाल सिर्फ एक सियासतदाँ की नाकामी नहीं बल्कि पूरे सियासी निज़ाम की अख़लाकी मौत की अलामत है।
परेशानी की बात यह है कि सियासतदाँ अवाम के दरमियान जाकर जम्हूरियत, सेक्युलरिज़्म और खिदमत के बड़े बड़े दावे करते हैं, मगर जब कोई शख्स सनजीदगी के साथ क़ौम की बहतरी के लिए अपनी खिदमात पेश करता है तो उसकी आवाज़ फाइलों, दलालों और सियासी एजंटों के दरमियान दफन कर दी जाती है। फिर यही लोग इंतेखाबी जलसों में मुसलमानों के मुस्तकबिल की फिक्र का ड्रामा करते हैं।
मेरे नज़दीक मुसलमानों को अब दूसरों के रहम-ओ-करम पर जीने के बजाय खुद अपने अंदर इंकलाब पैदा करना होगा। हमें तालीम को अपनी पहली तरजीह बनाना होगा। नौजवानों को हुनर, टेक्नोलॉजी, तिजारत और जदीद उलूम की तरफ लाना होगा। हमें ऐसे लीडरों को मुस्तरिद करना होगा जो सिर्फ जज़्बाती तकरीरें करते हैं मगर अमली मैदान में साबित होते हैं। फ़िरक़ापरस्ती, हसद और ज़ाती मफादात से ऊपर उठकर इज्तिमाई तरक्की के बारे में सोचना होगा।
अगर मुसलमान सच्चाई, मेहनत, इल्म और इत्तिहाद को अपना लें तो हालात बदल सकते हैं। लेकिन जब तक हम खुद अपनी इस्लाह नहीं करेंगे, तब तक सियासी जमातें हमें सिर्फ वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करती रहेंगी। क़ौमों की इज़्ज़त नारों, जज़्बाती तकरीरों या सियासी वादों से नहीं बल्कि करदार, इल्म और अमल से बहाल होती है।

