लंदन की फिज़ाओं में उर्दू की खुशबू
लंदन की फिज़ाओं में उर्दू की खुशबू

तहरीर : फहीम अख्तर लंदन
शाम का रंग धीरे-धीरे गहरा हो रहा था और लंदन के माहौल में एक खास सी अदबी ठंडक आ गई थी। घर से तैयार होकर जब बाहर कदम रखा तो दिमाग में एक ही ख्याल घूम रहा था कि आज की यह महफिल महज एक मुशायरा नहीं बल्कि उर्दू की एक और जिंदा रिवायत से मुलाकात है।
डॉक्टर अकरम शेख के हमराह सफर शुरू हुआ तो रास्ते की रोशनियों और शहर की मसरूफ खामोशी के दरमियान बातचीत भी उसी अदबी माहौल में ढलती चली गई, जैसे हर लम्हा किसी शेर की शक्ल इख्तियार कर रहा हो।
न्यू मोल्डेन के उस हॉल की तरफ बढ़ते हुए दिल में एक मानूस सा इंतजार था। वही इंतजार जो हर अदबी नशिस्त से पहले एक खास कैफियत पैदा करता है। दरवाजे के पास पहुंचते ही जब कदम अंदर की तरफ बढ़े तो फिजा में उर्दू अल्फाजों की बाज़गोश्त महसूस होने लगी। और उसी लम्हे मशहूर शायर गालिब माजेदी ने निहायत गर्मजोशी और मुहब्बत के साथ इस्तकबाल किया, जैसे किसी अदबी कारवां की पहली रस्म-ए-खैर मुकद्दम अदा हो रही हो।
बज़्म-ए-उर्दू लंदन का आलमी ईद मिलन मुशायरा उर्दू अदब के उन खूबसूरत और यादगार अदबी इज्तिमाआत में से एक था, जो न सिर्फ जबान व अदब की खिदमत करते हैं बल्कि मुख्तलिफ इलाकों में बसने वाले अहले कलम को एक प्लेटफार्म पर जमा करके तहजीबी रिश्तों को भी मजबूत करते हैं।
इस बज़्म की सदारत जनाब अकील दानिश ने फरमाई। निजामत के फराइज जनाब सोहैल जरार ख़लिश ने निहायत खुश असलूबी, रवानी और मुतवाजन अंदाज में अंजाम दिए।
इस महफिल की खास बात बर्लिन से तशरीफ लाए हुए मुमताज अदीब, नॉवल निगार, अफसाना व सफरनामा निगार जनाब सरवर ग़ज़ाली की बतौर मेहमान-ए-खास शिरकत थी। उनकी नज़्म "मिट्टी के माधो” बहुत उम्दा थी।
महफिल का आगाज़ मोहतरमा तानिया हसन की जानिब से बज़्म-ए-उर्दू लंदन के तआरुफ से हुआ, जिसकी बुनियाद उनके वालिद मरहूम सैयद हसन कैफी ने 1986 में रखी थी।
इस मौके पर राकिम ने भी बतौर शायर शिरकत की सआदत हासिल की। मुशायरे में लंदन के मुख्तलिफ इलाकों से तशरीफ लाए हुए शोआरा ने अपने ताजा, फिक्री और जज्बाती अशआर से सामईन को महजूज किया।
यह मुशायरा इस बात की रौशन मिसाल था कि उर्दू शायरी आज भी अपने अंदर वह तासीर रखती है जो दिलों को जोड़ती, फिक्र को जला बख्शती और तहजीबी शिनाख्त को मजबूत करती है।
लंदन और ब्रिटेन को तवील अरसे से उर्दू जबान व अदब का तीसरा बड़ा मरकज कहा जाता रहा है। बरे सगीर से बाहर, दिल्ली और लाहौर के बाद एक ऐसा शहर जहां उर्दू मुशायरों, अदबी तंजीमों और सकाफती सरगर्मियों ने अपनी एक मजबूत रिवायत कायम की।
मगर आज के हालात में यह सवाल ज्यादा संजीदगी से उठाया जा रहा है कि क्या वाकई लंदन अब भी "उर्दू का तीसरा मरकज” है, या यह सिर्फ एक खूबसूरत अदबी दावा बनकर रह गया है?
ब्रिटेन और इसकी राजधानी लंदन में उर्दू अदब की तारीख निस्बतन पुरानी नहीं मगर निहायत मासूर रही है। 1950 से लेकर 1990 की दहाइयों में हिजरत करने वाले अदीब, शायर और उस्ताद जब यहां आबाद हुए तो उन्होंने अदबी हलके, मुशायरे और अंजुमनें कायम कीं।
मगर आज सूरत-ए-हाल काफी मुख्तलिफ है। नई नस्ल जो ब्रिटेन में पैदा और परवान चढ़ी है, उसका उर्दू से रिश्ता कमजोर होता जा रहा है।
अगर हम मरकज को सिर्फ मुशायरों की तादाद या अदबी तंजीमों की मौजूदगी से नापें तो शायद यह दावा किसी हद तक बरकरार रखा जा सके। लेकिन अगर हम जिंदा अदबी तहरीक, नई तख्लीकी आवाजों, तन्कीदी मुकालमे और नौजवान शिरकत को मियार बनाएं तो यह सवाल उठता है कि क्या यह मरकजियत वाकई फेअल है या महज तारीखी शिनाख्त?
आठ बजने के बाद जब मुशायरे की फिजा अपने उरूज पर थी, उसी लम्हे निजामत की जानिब से एक निहायत बामानी और काबिल-ए-तवज्जो एलान वक्फे और नमाज-ए-मगरिब की अदायगी का हुआ।
हाल में मौजूद शोआरा ही नहीं बल्कि सामईन की बड़ी तादाद भी इस एलान के साथ एहतेरामन उठ खड़ी हुई।
यह मंजर बजाहिर सादा था मगर अपनी मानवीयत में निहायत गहरा। अदब और अकीदत का यह इम्तेजाज इस बात की रौशन मिसाल था कि तहजीबी महफिलें सिर्फ अल्फाजों की बाजीगरी नहीं होतीं।
अदबी महफिल अपनी जगह, मगर असल इम्तिहान अक्सर वक्फे में सामने आता है और यहां भी कुछ मुख्तलिफ न था। मुशायरे के दरमियान जब जरा सा वक्फा आया तो हाल के एक कोने में समोसे, छोले, मिठाई और नमक पारों की वह अदबी खिदमत सजी हुई थी।
इस महफिल में एक और पहलू मेरे लिए जाती तौर पर निहायत अहम और जज्बाती था। वह थी मारूफ अदीब, ड्रामा निगार, शायर और दानिशवर जनाब रिफअत शमीम की शिरकत।
रिफअत शमीम उन शख्सियतों में से हैं जिन्होंने अदब के सफर में न सिर्फ रहनुमाई का किरदार अदा किया बल्कि हौसला भी दिया और रास्ता भी दिखाया।
महफिल के इख्तिताम पर यह एहसास और गहरा हुआ कि बज़्म-ए-उर्दू लंदन न सिर्फ एक अदबी इदारा है बल्कि एक ऐसा तहजीबी पुल है जो मुख्तलिफ मुमालिक में बसने वाले उर्दू अदब के शायकीन को एक दूसरे से जोड़ता है।
लंदन की फिजाओं में उर्दू की खुशबू इस मुशायरे के जरिए यूं रच बस गई जैसे बरसों से बिछड़ी हुई कोई मुहब्बत अचानक लौट आई हो।
यह महज एक अदबी नशिस्त नहीं थी बल्कि एक एहसास था, एक तहजीब थी जो समंदर पार भी अपनी पूरी आब-ओ-ताब के साथ मौजूद है।

