अल्लाह को पियारी है कुर्बानी
लेखक: फहीम अख्तर, लंदन

इस्लाम धर्म में चंद्र वर्ष का बारहवाँ और अंतिम महीना ज़िलहिज्जा अत्यंत पवित्र और बरकत वाला माना जाता है। यह महीना अपनी आध्यात्मिक महत्ता के कारण मुसलमानों के दिलों में विशेष स्थान रखता है, क्योंकि इसी में दो महान इबादतें अदा की जाती हैं: कुर्बानी और ईद-उल-अज़हा। ये दोनों इबादतें अपने समय और अर्थ के अनुसार एक-दूसरे से गहरा संबंध रखती हैं।
ईद-उल-अज़हा तीन दिनों पर आधारित एक खुशियों भरा त्योहार है, जो कुछ पहलुओं से ईद-उल-फितर से समानता रखता है। यह अवसर परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों के साथ बैठने, खुशियाँ बाँटने, उपहारों के आदान-प्रदान, स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेने और सामूहिक इबादत करने का होता है। जिस तरह ईद-उल-फितर, रमज़ान-उल-मुबारक के रोज़ों की पूर्णता पर शुक्राने के रूप में मनाई जाती है, उसी तरह ईद-उल-अज़हा अल्लाह की रज़ा के लिए कुर्बानी जैसी महान इबादत की अदायगी के बाद मनाई जाती है। यह त्योहार हमें त्याग, कुर्बानी और इताअत-ए-इलाही (अल्लाह की आज्ञा का पालन) का सबक सिखाता है, जो हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माइल की अमर कुर्बानी की याद दिलाता है।
ज़िलहिज्जा इस्लामी कैलेंडर का एक महत्वपूर्ण महीना है और दुनिया भर के मुस्लिम आखिरी इस्लामी महीने ज़िलहिज्जा की दस तारीख को ईद-उल-अज़हा मनाते हैं। हर साल की तरह इस साल भी लाखों खुशनसीब अल्हम्दुलिल्लाह हज के फ़राइज़ अदा कर रहे हैं। इसके अलावा दुनिया भर में जज़्बा-ए-कुर्बानी से सराबोर करोड़ों मुसलमान अपने-अपने तौर पर जानवरों की कुर्बानी करके अल्लाह से अपनी मुहब्बत का बेहतरीन नमूना पेश करते हैं। जिससे मुसलमानों में अल्लाह से कुर्बती (निकटता) का एहसास होता है और वह अल्लाह की इस हिदायत को मरते दम तक कायम रखता है।
हर साल इस्लामी महीने ज़िलहिज्जा की 8 से 12 तारीख को दुनिया भर के मुस्लिम मक्का मुकर्रमा पहुँचकर एक विशिष्ट इबादत करते हैं जिसे हज कहा जाता है। इस्लाम में हज जीवन में एक बार फ़र्ज़ है। क़ुरआन-ए-मुक़द्दस ने फरमाया है: ‘और लोगों में ऊँची आवाज़ से हज का एलान कर दीजिए कि वे आपके पास दूर-दराज़ रास्तों से पैदल और पतले-दुबले ऊँटों पर सवार होकर आएँगे।’ (सूरह अल-हज: आयत 27)
हज इस्लाम के 5 स्तंभों में से आखिरी स्तंभ है। हर साल हज की शुरुआत 8 ज़िलहिज्जा से होती है। सभी हाजी मीकात से एहराम बाँधकर काबा की ज़ियारत के लिए रवाना होते हैं, जहाँ वह तवाफ करते हैं। फिर मिना के लिए रवाना होते हैं, जहाँ वह यौम-उत-तर्विया गुज़ार कर अरफात आते हैं और यहाँ एक दिन क़याम करते हैं। इसी दिन को यौम-ए-अरफह, यौम-ए-सई, यौम-ए-हल्क़ व क़सर आदि भी कहते हैं। इसके बाद हजाज (हज करने वाले) कंकड़ियाँ फेंकने के लिए जमरा अक़बा जाते हैं। फिर मक्का वापस आकर तवाफ-ए-इफाज़ा करते हैं और फिर वापस मिना जाकर अय्याम-ए-तशरीक़ गुज़ारते हैं। इसके बाद हजाज दोबारा मक्का वापस आकर तवाफ-ए-विदा करते हैं और यूँ हज पूरा होता है।
हिजरत के नौवें साल में हज फ़र्ज़ हुआ। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सन 10 हिजरी में केवल एक हज किया जिसे हज्जत-उल-विदा (विदाई हज) कहा जाता है। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस हज में हज के सभी स्तंभों को सही करके दिखाया और एलान किया: ‘अपने हज के तरीके मुझसे ले लो।’ जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अपने ऊँट पर सवार होकर जमरात (स्तंभों) को कंकड़ियाँ मारते हुए देखा, और आप फरमा रहे थे: ‘लोगो! मुझसे अपने हज के तरीके सीख लो क्योंकि मैं नहीं जानता, शायद मैं इस साल के बाद आइंदा हज न कर सकूँ।’ (सुनन नसाई / किताब मनासिक अल-हज / हदीस: 3064)। हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इसी हज के दौरान अपना प्रसिद्ध खुतबा हज्जत-उल-विदा भी दिया और इसमें दीन-ए-इस्लाम की सभी बुनियादी बातों और नियमों तथा इसकी पूर्णता का एलान किया।
हज अदा करने के पाँच शर्तें हैं। पहली शर्त मुसलमान होना, गैर मुसलमानों पर हज फ़र्ज़ नहीं और न ही उनके लिए मनासिक-ए-हज अदा करना जायज़ है। दूसरी शर्त अक्ल (बुद्धि) है, पागल पर हज फ़र्ज़ नहीं। तीसरी शर्त बुलूग़ (युवावस्था) है, नाबालिग बच्चे पर हज फ़र्ज़ नहीं। चौथी शर्त आज़ादी है, ग़ुलाम और लौंडी पर हज फ़र्ज़ नहीं। पाँचवीं शर्त इस्तिताअत (सामर्थ्य) है, इस्तिताअत का अर्थ यह है कि हज केवल उन व्यक्तियों पर फ़र्ज़ है जो इसकी शारीरिक और आर्थिक सामर्थ्य रखते हों (औरत पर शरई महरम होना भी ज़रूरी है)। हम सभी मुसलमानों की एक ख्वाहिश ज़रूर होती है कि जीवन में एक बार हज ज़रूर करे। इस्लाम के पाँच महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक स्तंभ हज भी है। जैसे-जैसे दुनिया भर में मुसलमानों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो रही है और सऊदी सरकार की सुविधाएँ आसान हो रही हैं, हज का सफर भी अब बहुत आसान होता जा रहा है। हालाँकि उमरा के संदर्भ में मेरा अपना अनुभव यह है कि सभी सुविधाओं के बावजूद उमरा और हज की अदायगी एक अनूठी और थका देने वाली इबादत है, जिसे इंसान अल्लाह की मुहब्बत और जज़्बे से अदा कर लेता है और इस इबादत को सोच कर दिमाग ज़िंदगी की आसाइशों (सुख-सुविधाओं) से लापरवाह हो जाता है।
मुझे इस बात से दिली खुशी होती है जब कोई व्यक्ति हज कम उम्र में अदा करता है। विशेषकर इंडोनेशिया, मलेशिया और तुर्की आदि ऐसे देश हैं जहाँ कम उम्र में हज करना ज़रूरी समझा जाता है। हालाँकि इसके विपरीत भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि ऐसे देश हैं जहाँ से अधिकतर लोग हज की अदायगी का इरादा उस समय करते हैं जब वे उम्र के आखिरी पड़ाव पर होते हैं। इसकी कई वजहें भी हैं। एक तो आर्थिक रूप से सक्रिय न होना। दूसरा पारंपरिक रूप से यह सोच कर इंतज़ार करना कि जब सभी चीजों से फ़ारिग (खाली) हो जाएँगे तब हज के लिए रवाना होंगे। जिसके कारण आमतौर पर शारीरिक तकलीफें बढ़ जाती हैं और काफी कठिनाइयों व दिक्कतों से हज की अदायगी करनी पड़ती है। हालाँहि धीरे-धीरे यह रिवाज बदल रहा है और युवाओं में हज के फ़राइज़ पूरा करने का रुझान बढ़ रहा है।
ईद-उल-अज़हा रब्ब-ए-करीम के प्यारे पैग़ंबर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की उस महान कुर्बानी की याद है जब आपने लगातार तीन रातें सपने में कुर्बानी का हुक्म पाकर अपने लाल (बेटे) हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम के गले पर अल्लाह के हुक्म से छुरी रख दी थी। अल्लाह तआला को हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की यह बात इतनी पसंद आई कि अल्लाह तआला ने हज़रत जिबरील-ए-अमीन को जन्नत से दुम्बा (मेंढ़ा) ले जाने का हुक्म दिया और उसे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की जगह ज़िब्ह (कुर्बान) कराया। फिर अल्लाह तआला ने इस सुन्नत-ए-इब्राहीमी को हमेशा के लिए कायम फरमाया। चुनांचे अल्लाह तआला ने क़ुरआन में इरशाद फरमाया: ‘हमने हर उम्मत (समुदाय) के लिए कुर्बानी मुकर्रर की ताकि वह अल्लाह तआला के (पाक) नाम का (जप) उन बेज़बान जानवरों पर ज़िब्ह (कुर्बानी) करते समय करें जो अल्लाह तआला ने उन्हें अता फरमाए हैं।’ अल्लाह तआला ने क़ुरआन में यह भी फरमाया कि ‘अल्लाह तआला को इन जानवरों के गोश्त (माँस) और खून की ज़रूरत नहीं। वह तो केवल यह देखता है कि तुम्हारे दिलों में खौफ-ए-इलाही (अल्लाह का डर) और तक़वा (परहेजगारी) मौजूद है।’
कुर्बानी की अदायगी के लिए चार शर्तों का होना ज़रूरी है: मुसलमान होना, आज़ाद होना, मुकीम (निवासी) होना और खुशहाल (समृद्ध) होना। अगर किसी ने कुर्बानी की जगह ज़िंदा जानवर या उसकी कीमत सदक़ा (दान) कर दी तो यह जायज़ नहीं है।
सोशल मीडिया पर कुछ अहमक (मूर्ख) लोगों ने अपने विचारों को पेश करते हुए ऊटपटांग बातें कही हैं जो धार्मिक दृष्टिकोण से गलत हैं। मसलन एक पोस्ट में यह कहा गया कि ‘कुर्बानी के साथ-साथ चैरिटी (दान) भी करें’। इसी तरह का एक और पोस्ट कुर्बानी के संदर्भ में नज़र से गुज़रा कि ‘इंसान अपने अंदर के जानवर को मार कर कुर्बानी करें’। मुझे ऐसे पोस्ट देखकर हैरानी के साथ अफ़सोस भी हुआ। क्योंकि इन लोगों ने अपने निजी विचारों को धर्म से जोड़कर एक गलत काम किया है। बात यहीं तक नहीं थी बल्कि इन लोगों के गैर-ज़िम्मेदाराना बयान से गैर मुसलमानों ने उनकी खूब वाहवाही की जो कि एक अफ़सोसनाक बात है। कुर्बानी को चैरिटी (दान) से जोड़ना एक निहायत शर्मनाक बात है। जिससे अल्लाह तआला के हुक्म की नाफरमानी (अवज्ञा) होती है जो कि एक गुनाह है। मैं ऐसे लोगों से दरख्वास्त (अनुरोध) करूँगा कि वह अपनी झूठी शोहरत और नाम नुमूद (प्रसिद्धि) के लिए ऐसी ऊटपटांग बातें करके फितना (उपद्रव) न फैलाएँ और मज़हब-ए-इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश न करें।
अल्लाह तआला को कुर्बानी बहुत महबूब (प्रिय) है। बशर्ते कि वह इख़लास (निष्कपटता), तक़वा (परहेजगारी) और अल्लाह की रज़ा (प्रसन्नता) के लिए की जाए। क़ुरआन-ए-पाक में अल्लाह तआला फरमाते हैं: ‘न अल्लाह तक उन (कुर्बानी के जानवरों) का गोश्त पहुँचता है और न उनका खून, बल्कि तुम्हारी तरफ से तक़वा उस तक पहुँचता है।’ (सूरह अल-हज: आयत 37) हज़रत आयशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है, रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया: "बनी आदम ने कुर्बानी के दिन (ईद-उल-अज़हा) कोई अमल (कर्म) ऐसा नहीं किया जो अल्लाह के नज़दीक खून बहाने से ज़्यादा पसंदीदा हो और बेशक वह (कुर्बानी का जानवर) क़ियामत के दिन अपने सींगों, बालों और खुरों के साथ आएगा और कुर्बानी का खून ज़मीन पर गिरने से पहले अल्लाह के हाँ क़बूल कर लिया जाता है, पस खुशदिली से कुर्बानी किया करो।” (तिर्मिज़ी, इब्न माजा)
कुर्बानी महज गोश्त (माँस) खाने या रस्म (परंपरा) अदा करने का नाम नहीं है। बल्कि कुर्बानी अल्लाह की रज़ा के लिए अपनी पसंदीदा चीज़ को पेश करने की सुन्नत-ए-इब्राहीमी है और अल्लाह को वही कुर्बानी प्यारी है जो दिल के इख़लास (निष्कपटता) और तक़वा (परहेजगारी) के साथ की जाए।
मैं आप सभी लोगों को ईद-उल-अज़हा की मुबारकबाद पेश करता हूँ। अल्लाह से दुआगो हूँ कि पूरे आलम (विश्व) में मुसलमानों को महफूज़ (सुरक्षित) रखे और पूरी दुनिया पर अल्लाह रहम फरमाए।

