दहर में इस्म-ए-मुहम्मद ﷺ से उजाला कर दे

दहर में इस्म-ए-मुहम्मद ﷺ से उजाला कर दे

दहर में इस्म-ए-मुहम्मद ﷺ से उजाला कर दे


तहरीर: फ़हीम अख़्तर, लंदन

रबीउल अव्वल का चाँद तुलू’ होते ही मुसलमानों के दिलों में एक अजीब सी कैफ़ियत पैदा हो जाती है। फ़िज़ाएँ दुरूद व सलाम से महकने लगती हैं, महफ़िलें सजती हैं, न’अतों की आवाज़ें बुलंद होती हैं और हर तरफ़ रसूल-ए-अक्रम हज़रत मुहम्मद ﷺ से मुहब्बत का इज़हार नज़र आता है। इस की बुनियादी वजह यह है कि यही वह मुबारक महीना है जिस में ख़ातिम-उन-नबिय्यीन हज़रत मुहम्मद ﷺ दुनिया में तशरीफ़ लाए।

दुनिया के मुख़्तलिफ़ इलाक़ों में मुसलमान अपने-अपने अंदाज़ में इस निस्बत को याद करते हैं। कहीं महाफ़िल-ए-मीलाद मुन’अक़िद होती हैं, कहीं सीरत-उन-नबी ﷺ के इज्तिमा’आत होते हैं और कहीं जुलूस व चिराग़ाँ के ज़रिए ‘अक़ीदत का इज़हार किया जाता है। हमारे लिए यह मौक़ा सिर्फ़ ख़ुशी मनाने का नहीं, बल्कि अपने दिल से यह सवाल करने का भी है कि जिस हस्ती से हम मुहब्बत का दावा करते हैं, क्या हमारी ज़िन्दगी में उन की ता’लीमात की कोई झलक भी मौजूद है?

मेरे नज़दीक रसूल-ए-अक्रम ﷺ से मुहब्बत का सब से ख़ूबसूरत इज़हार यह है कि हम आप ﷺ की सीरत को अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाएँ। मज़हब मेरे नज़दीक महज़ चंद अहकाम का मजमू’आ नहीं। इस्लाम एक मुकम्मल तरीक़-ए-ज़िन्दगी है, ऐसा रास्ता जो इंसान को सिर्फ़ इबादत का तरीक़ा नहीं सिखाता, बल्कि उसे एक अच्छा, दयानतदार, रहमदिल, साबिर, मा’फ़ करने वाला और ज़िम्मेदार इंसान बनने की तरबियत भी देता है। और यही वह मुक़ाम है जहाँ सीरत-ए-रसूल ﷺ हमारे लिए आज भी उतनी ही मुत’अल्लिक़ है जितनी चौदह सौ बरस पहले थी।

हज़रत मुहम्मद ﷺ की शख़्सियत इंसानी तारीख़ का एक ऐसा रौशन बाब है जिस में ‘अक्ल व हिकमत, रहमत व शफ़क़त, ‘अदल व इंसाफ़, सब्र व बर्दाश्त और आ’ला अख़्लाक़ एक साथ नज़र आते हैं। आप ﷺ ने इंसान को उस की असली हक़ीक़त से रौशनास कराया, उसे ज़िन्दगी का मक़सद समझाया और उसे यह एहसास दिया कि इंसान महज़ अपनी ख़्वाहिशात की तकमील के लिए दुनिया में नहीं आया। आप ﷺ ने इंसान को बताया कि ज़िन्दगी एक ज़िम्मेदारी है, एक इम्तिहान है और एक अमानत है। आप ﷺ की ता’लीमात ने इंसान को तीन बुनियादी रास्ते दिखाए: हक़ीक़त की मा’रिफ़त, अख़्लाक़ की बुलंदी और ‘अक्ल व शु’ऊर का इस्ते’mाल।

इस्लाम से पहले ‘अरब मा’शरे में क़बाइली त’अस्सुबात, बुत-परस्ती, ताक़त का ग़ुरूर और कमज़ोरों पर ज़ुल्म ‘आम था। ऐसे माहौल में रसूल-ए-अक्रम ﷺ ने एक निहायत सादा मगर इंक़िलाबी पैग़ाम दिया: अल्लाह एक है, इंसान बराबर हैं और ज़िन्दगी ज़िम्मेदारी का नाम है। यह पैग़ाम सिर्फ़ ‘अक़ीदे की तब्दीली नहीं था, यह इंसानी किरदार की ता’मीर का आग़ाज़ था।

आज हम जिस दुनिया में रहते हैं, वहाँ तरक़्क़ी के बावजूद इंसान पहले से कहीं ज़्यादा तन्हाई, ख़ुदग़र्ज़ी, माद्दा-परस्ती और बे-ए’तिमादी का शिकार दिखाई देता है। दौलत बढ़ रही है मगर दिल सिकुड़ रहे हैं। राबिते बढ़ गए हैं मगर ता’ल्लुक़ात कमज़ोर हो रहे हैं। इंसान के पास दूसरों तक पहुँचने के हज़ारों ज़राए’ हैं लेकिन एक दूसरे को समझने का हौसला कम होता जा रहा है। ऐसे में सीरत-ए-रसूल ﷺ हमें दोबारा रहमत, मुहब्बत, सब्र, ईसार, ‘अफ़्व व दरगुज़र और हुस्न-ए-सुलूक की तरफ़ बुलाती है।

रसूल-ए-अक्रम ﷺ ने इंसानी ता’ल्लुक़ात को मज़बूत बनाने के लिए अख़्लाक़ को बुनियादी अहमियत दी। आप ﷺ की ज़िन्दगी हमें बताती है कि किसी इंसान की ‘अज़मत उस की दौलत, मंसब या शोहरत से नहीं, बल्कि उस के किरदार से मुत’अय्यन होती है। शुक्रगुज़ारी भी सीरत-ए-नबवी ﷺ का एक अहम पहलू है। हदीस-ए-मुबारक का मफ़हूम है कि जो लोगों का शुक्र अदा नहीं करता, वह अल्लाह का भी शुक्र अदा नहीं करता। ज़रा ग़ौर कीजिए! आज हमारे मा’शरे में शिकायत बहुत है और शुक्र कम। हम दूसरों की ग़लतियाँ फ़ौरन देख लेते हैं लेकिन उन की छोटी सी नेकी को नज़र-अंदाज़ कर देते हैं। हम मा’फ़ी माँगने से ज़्यादा मा’फ़ करने की उम्मीद रखते हैं। हालाँकि रसूल-ए-अक्रम ﷺ की ज़िन्दगी हमें मा’फ़ी और दरगुज़र का ग़ैर-म’आमूली सबक़ देती है।

ताइफ़ का वाक़ि’आ सीरत-ए-नबवी ﷺ का ऐसा बाब है जिसे याद करते हुए दिल बे-इख़्तियार झुक जाता है। जब अहल-ए-ताइफ़ ने आप ﷺ की दा’वत क़ुबूल करने के बजाए आप पर पत्थर बरसाए, आप लहूलुहान हो गए, जिस्म ज़ख़्मी हो गया, लेकिन आप ﷺ ने बद-दुआ के बजाए रहमत का रास्ता इख़्तियार किया। यही वह मुक़ाम है जहाँ हमें समझ आता है कि मुहब्बत सिर्फ़ दावा नहीं, मुहब्बत अपने रद्द-ए-‘अमल में ज़ाहिर होती है।

जो शख़्स हमें तकलीफ़ दे, उसे मा’फ़ कर देना आसान नहीं। जो हमारे ख़िलाफ़ बोले, उस के लिए ख़ैर चाहना आसान नहीं। लेकिन रसूल-ए-अक्रम ﷺ ने हमें यही मुश्किल रास्ता दिखाया। आज अगर हम मीलाद-ए-रसूल मना रहे हैं तो हमें अपने अंदर यह सवाल ज़रूर पैदा करना चाहिए कि क्या हमारे अख़्लाक़ में भी रहमत-ए-मुहम्मदी की कोई झलक है? क्या हम अपने वालिदैन के साथ हुस्न-ए-सुलूक करते हैं? क्या हम अपने पड़ोसी का ख़याल रखते हैं? क्या हम किसी ज़रूरतमंद की मदद करते हैं? क्या हम अपने मातहत से ‘इज़्ज़त से पेश आते हैं? क्या हम इख़्तिलाफ़ रखने वाले इंसान को भी एहतिराम देते हैं? क्या हम ग़ुस्से के वक़्त अपने आप को क़ाबू में रखते हैं? और सब से बढ़कर, क्या हम किसी ऐसे शख़्स को मा’फ़ कर सकते हैं जिस ने हमारे साथ ज़्यादती की हो? यह सवालात किसी एक दिन के नहीं। यह पूरी ज़िन्दगी के सवालात हैं।

इस्लाम ने ‘इल्म को भी ग़ैर-म’आमूली अहमियत दी। क़ुरआन का पहला पैग़ाम ही "इक़रा” यानी पढ़ने का हुक्म है। यह इस बात की ‘अलामत है कि इस्लाम इंसान को जहालत में नहीं बल्कि ‘इल्म, ग़ौर-ओ-फ़िक्र और शु’ऊर में आगे बढ़ने की दा’वत देता है। इसलिए उर्दू के एक अदीब की हैसियत से मुझे यह बात भी अहम महसूस होती है कि हम अपने नौजवानों को सिर्फ़ अपनी तहज़ीबी और मज़हबी तारीख़ से वाक़िफ़ न कराएँ बल्कि उन्हें ‘इल्म, तहक़ीक़, सवाल करने और सोचने की आज़ादी भी दें। रसूल-ए-अक्रम ﷺ की सीरत हमें एक ऐसा इंसान बनाने की दा’वत देती है जो ‘इबादतगुज़ार भी हो और ज़िम्मेदार शहरी भी, ‘इल्म-दोस्त भी हो और रहमदिल भी, अपने हुक़ूक़ से वाक़िफ़ भी हो और दूसरों के हुक़ूक़ का मुहाफ़िज़ भी हो।

आज हम मुसलमानों के मसाइल का ज़िक्र बहुत करते हैं। हम पूछते हैं कि मुसलमान दुनिया में कमज़ोर क्यों हैं? हमें बदनाम क्यों किया जाता है? हमारे दरमियान इख़्तिलाफ़ात क्यों हैं? हम ‘इल्मी और मा’आशी मैदान में पीछे क्यों हैं? लेकिन शायद हमें इन सवालात के साथ एक और सवाल भी पूछना चाहिए, क्या हम ने अपनी ज़िन्दगी में रसूल-ए-अक्रम ﷺ की ता’लीमात को वाक़ई जगह दी है? अगर हम नमाज़ पढ़ते हैं मगर झूठ बोलते हैं, रोज़ा रखते हैं मगर दूसरों का हक़ खाते हैं, न’अत पढ़ते हैं मगर किसी इंसान की ‘इज़्ज़त पामाल करते हैं, मीलाद मनाते हैं मगर दिल में नफ़रत रखते हैं, तो हमें अपने ‘अमल पर ज़रूर ग़ौर करना चाहिए।

रसूल-ए-अक्रम ﷺ की मुहब्बत का तक़ाज़ा सिर्फ़ ज़बान से दुरूद पढ़ना नहीं, आप की पसंदीदा सिफ़ात को अपनी शख़्सियत में पैदा करना भी है। सच्चाई, अमानत, ‘अदल, रहम, सख़ावत, सब्र, शुक्र, ‘अफ़्व, हुस्न-ए-अख़्लाक़ और इंसानों के साथ मुहब्बत, यही वह चिराग़ हैं जो सीरत-ए-रसूल ﷺ हमारे हाथ में देती है। और शायद आज की दुनिया को इन्हीं चिराग़ों की सब से ज़्यादा ज़रूरत है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हज़रत मुहम्मद ﷺ किसी एक क़ौम, ‘इलाक़े या ज़माने के लिए नहीं आए थे। आप ﷺ की ता’लीमात में पूरी इंसानियत के लिए ख़ैर, रहमत और रहनुमाई मौजूद है। इसीलिए सीरत-ए-रसूल ﷺ आज भी दुनिया के हर उस इंसान के लिए अहम है जो एक बेहतर, ‘आदिल और पुर-अमन मा’शरे का ख़्वाब देखता है।

मीलाद-ए-रसूल ﷺ अगर हमें मुहब्बत सिखाता है तो वह मुहब्बत ‘अमल भी माँगती है। अगर हमें दुरूद पढ़ना आता है तो हमें दुरूग़ से भी बचना होगा। अगर हमें न’अत पढ़ना आता है तो हमें नफ़रत से भी बचना होगा। अगर हमें रसूल-ए-अक्रम ﷺ से मुहब्बत है तो हमें उन के अख़्लाक़ को भी अपनी ज़िन्दगी में जगह देनी होगी। तभी मीलाद का चिराग़ हमारे घरों से निकल कर हमारे किरदार, हमारे मा’शरे और पूरी दुनिया को रौशन कर सकेगा।

आज रबीउल अव्वल के इस मुबारक मौक़े पर हमें अपने दिल में यह ‘अहद करना चाहिए कि हम रसूल-ए-अक्रम ﷺ की सीरत को सिर्फ़ किताबों में नहीं बल्कि अपने किरदार में ज़िन्दा रखेंगे। हम किसी को तकलीफ़ नहीं देंगे। हम कमज़ोर का सहारा बनेंगे। हम इख़्तिलाफ़ में भी अख़्लाक़ का दामन नहीं छोड़ेंगे। हम ‘इल्म हासिल करेंगे। हम सच बोलेंगे। हम मा’फ़ करना सीखेंगे। और अपने ‘अमल से दुनिया को बताएँगे कि हज़रत मुहम्मद ﷺ से मुहब्बत सिर्फ़ एक जज़्बाती निस्बत नहीं बल्कि एक मुकम्मल अख़्लाक़ी ज़िम्मेदारी है।

‘अल्लामा इक़बाल ने इसी हक़ीक़त को किस ख़ूबसूरती से बयान किया है:
"क़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर दे,
दहर में इस्म-ए-मुहम्मद ﷺ से उजाला कर दे।”
आइए! इस रबीउल अव्वल में हम सिर्फ़ अपने घरों को चिराग़ाँ न करें, अपने किरदार को भी रौशन करें। सिर्फ़ महफ़िलें न सजाएँ, अपने दिल भी सजाएँ। सिर्फ़ न’अतें न पढ़ें, सीरत को भी पढ़ें। और सिर्फ़ मुहब्बत का इज़हार न करें, मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ को अपनी ज़िन्दगी का ‘अमल बना दें। क्योंकि जब सीरत-ए-मुहम्मद ﷺ हमारे किरदार में उतरेगी, तभी वाक़ई, दहर में इस्म-ए-मुहम्मद ﷺ से उजाला होगा।

तहरीर: फ़हीम अख़्तर, लंदन

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