हरे-भरे यॉर्कशायर में दो डॉक्टर और हम

हरे-भरे यॉर्कशायर में दो डॉक्टर और हम

लेखक: फ़हीम अख़्तर, लंदन

बचपन से ही नई जगहें देखने, विभिन्न सभ्यताओं से परिचित होने और नए लोगों से मिलने का मुझे बेहद शौक रहा है। मेरा हमेशा यह विश्वास रहा है कि हर यात्रा इंसान को न केवल एक नई मंज़िल तक पहुँचाती है, बल्कि उसे नए अनुभवों, नई सोच और नई दोस्तियों से भी रूबरू कराती है।

शायद यही वजह है कि जब भी किसी नई जगह जाने का मौका मिलता है, तो दिल एक अनजानी खुशी और उत्सुकता से भर जाता है। इसी शौक की पूर्ति का एक खूबसूरत अवसर तब मिला, जब कोलकाता के विख्यात सर्जन डॉ. एम.एन. हक़ का स्नेहपूर्ण निमंत्रण मिला। उन्होंने यॉर्कशायर के इलाक़े मेनस्टोन में रहने वाले प्रतिष्ठित ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. ख़ंदेकर अबू हुसैन से मुलाक़ात का न्योता दिया। यह महज़ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि ज्ञान, दोस्ती, यादों और खूबसूरत नज़ारों से भरे कुछ ऐसे दिन थे, जो हमेशा दिमाग़ की खिड़कियों पर रोशन रहेंगे।

शनिवार, २७ जून की सुबह हम लंदन के मशहूर किंग्स क्रॉस स्टेशन से ट्रेन में सवार हुए। करीब तीन घंटे का सफर इंग्लैंड के देहाती हुस्न का लुत्फ़ उठाते हुए तय हुआ। खिड़की के बाहर हरे-भरे खेत, नरम ढलानें, छोटे-छोटे गाँव, पेड़ों की कतारें और यॉर्कशायर की खूबसूरत वादियाँ लगातार हमारा ध्यान अपनी ओर खींचती रहीं। लीड्स पहुँचने पर डॉ. ख़ंदेकर अबू हुसैन स्वागत के लिए मौजूद थे। वहाँ से एक और ट्रेन के ज़रिए हम मेनस्टोन पहुँचे, फिर उनकी कार में सवार होकर होटल हेलोन की ओर रवाना हुए। पूरे रास्ते डॉ. ख़ंदेकर अबू हुसैन की प्रफुल्लित बातचीत, उनके चिकित्सीय अनुभव, कोलकाता की यादें और ब्रिटेन में बिताए लंबे समय के दिलचस्प क़िस्से सफर को और भी सुहावना बनाते रहे।

डॉ. ख़ंदेकर अबू हुसैन ने कोलकाता नेशनल मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और इंग्लैंड से एफआरसीएस की डिग्री हासिल की। वह एक सीनियर रिटायर्ड ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं, जिन्होंने अपनी पूरी व्यावहारिक ज़िंदगी चिकित्सा के क्षेत्र के लिए समर्पित कर दी।

होटल हेलोन बेहद शांत वातावरण में स्थित था। उसके पास विशाल गोल्फ़ ग्राउंड अपनी हरियाली, ख़ामोशी और खूबसूरती की वजह से दिल को बेहद भाया। शाम के वक़्त वहाँ टहलते हुए ऐसा महसूस होता था मानो कुदरत अपनी सारी रंगीनियों के साथ इंसान को अपनी गोद में समेट रही हो। ठंडी हवा, हरियाली, पक्षियों की आवाज़ें और दूर तक फैले नज़ारे देर तक दिमाग़ पर नक्श रहे। शनिवार शाम को मेनस्टोन के ‘मुंबई विलेज’ रेस्तराँ में स्वादिष्ट हिंदुस्तानी खानों का लुत्फ़ उठाया, जबकि रविवार को लीड्स के एक पाकिस्तानी रेस्तराँ में पारंपरिक पाए और गरम-गरम नान ने परदेस में अपने वतन की खुशबू ताज़ा कर दी।

डॉ. ख़ंदेकर अबू हुसैन का ताल्लुक़ पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक शहर मुर्शिदाबाद के पास स्थित सालार से है। बातचीत के दौरान पता चला कि उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के मौलाना आज़ाद कॉलेज से भी हासिल की थी। मेरे लिए यह एक असाधारण खुशी का पल था, क्योंकि मैं भी इसी महान शिक्षण संस्था का छात्र रहा हूँ और वहाँ जनरल सेक्रेटरी चुने जाने का गौरव प्राप्त कर चुका हूँ। ऐसा महसूस हुआ मानो सालों का फ़ासला कुछ पलों में सिमट आया हो।

बातचीत के दौरान डॉ. ख़ंदेकर अबू हुसैन ने अपनी ज़िंदगी का एक ऐसा पहलू भी बड़ी ही दर्दनाकी से बयान किया, जिसने मुझे बेहद प्रभावित किया। उन्होंने बताया कि व्यावसायिक ज़िंदगी में सफलता, शोहरत और व्यस्तताओं के बावजूद उन्हें हमेशा इस बात का अफसोस रहा कि कुरान-ए-मजीद को समझकर पढ़ने और इस्लामी शिक्षाओं से गहरी वाक़फ़ियत हासिल करने का मौका उन्हें बहुत देर से मिला। बातचीत के एक दौरान उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा: ”मुझे आपसे जलन होती है।” मैंने हैरानी से वजह पूछी तो वह बोले: ”काश! मुझे भी बचपन से ही कुरान पढ़ने, उसके अनुवाद को समझने और इस्लामी शिक्षाओं से आशना होने का मौका मिला होता। अफसोस कि जब मैं सैंतालीस साल का हुआ, तब मुझे एहसास हुआ कि मैंने अपनी ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ दुनियावी व्यस्तताओं में गुज़ार दिया।” उनके लहज़े में न केवल पछतावा था बल्कि दृढ़ संकल्प भी था। उन्होंने बताया कि अब वह नियमित रूप से कुरान-ए-मजीद को अनुवाद और अर्थ के साथ पढ़ते हैं, उसकी शिक्षाओं पर ग़ौर करते हैं और अपनी ज़िंदगी को अल्लाह तआला की रज़ा के मुताबिक़ गुज़ारने की कोशिश करते हैं। उन्होंने बड़े संतोष के साथ कहा कि अब उन्हें इस बात पर गर्व है कि ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ दुनियावी कामयाबियाँ नहीं, बल्कि अल्लाह तआला की ख़ुशनूदी हासिल करना है। उनकी इस बात ने मेरे दिल पर गहरा असर छोड़ा कि इंसान के लिए हिदायत का दरवाज़ा जब भी खुले, वही उसकी असली कामयाबी की शुरुआत होती है।

इस पूरे सफर में डॉ. एम.एन. हक़ का स्नेह, ईमानदारी और खुशमिज़ाजी हर पल झलकती रही। वह खुद भी इस छोटी सी यात्रा और मुलाक़ात से बेहद खुश थे। हमारी बातचीत में चिकित्सा, शिक्षा, इतिहास, कोलकाता की यादें, ब्रिटेन की ज़िंदगी और सामाजिक विषय शामिल रहे, जिसने इस सफर को सिर्फ एक मनोरंजक दौरा ही नहीं, बल्कि एक वैचारिक और बौद्धिक गोष्ठी भी बना दिया।

इस सफर में डॉ. एम.एन. हक़ के व्यक्तित्व का एक और रौशन पहलू भी मेरे सामने आया। डॉ. एम.एन. हक़ का व्यक्तित्व सिर्फ एक कामयाब सर्जन तक सीमित नहीं है, बल्कि वह चिकित्सा, शिक्षा, सामाजिक सेवा और जन-हितकारी गतिविधियों का एक रोशन प्रतीक हैं। वह एक सीनियर जनरल लेप्रोस्कोपिक सर्जन और लेज़र प्रोक्टोलॉजिस्ट हैं और कोलकाता के मशहूर जी.डी. अस्पताल एवं मधुमेह संस्थान में सर्जरी विभाग के पूर्व एमेरिटस प्रमुख रह चुके हैं, जबकि इस्लामिया अस्पताल के मानद अधीक्षक के रूप में भी सेवाएँ दे चुके हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाओं के साथ-साथ वह सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्रों में भी बेहद सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वह इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (ख़िदीरपुर शाखा) के अध्यक्ष, कोलकाता ख़िलाफ़त कमेटी के उपाध्यक्ष, पश्चिम बंगाल राज्य हज कमेटी के पूर्व सदस्य और कई जनहितकारी व राहत संस्थाओं से जुड़े हैं।

उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिए डॉ. एम.एन. हक़ पब्लिक स्कूल भी स्थापित किया, जो उनकी दूरदर्शिता और राष्ट्र की नई पीढ़ी के प्रति चिंता का प्रतीक है। उनके व्यक्तित्व में एक कामयाब चिकित्सक, संवेदनशील समाजसेवी, ईमानदार नेता और उर्दू भाषा व साहित्य से प्रेम करने वाले सुशिक्षित इंसान की सारी खूबियाँ एकजुट नज़र आती हैं। यही वजह है कि वह चिकित्सा हलकों के साथ-साथ सामाजिक और बौद्धिक दुनिया में भी बेहद सम्मान की नज़र से देखे जाते हैं। हालाँकि बातचीत के दौरान उनके लहज़े में एक दर्द भी स्पष्ट था। उन्होंने अफसोस जताया कि कुछ लोग निजी हितों, अहंकार और गुटबाज़ी को सामूहिक हितों पर तरजीह देते हैं, जिसके कारण न केवल कल्याणकारी संस्थाओं का प्रदर्शन प्रभावित होता है, बल्कि समाज व राष्ट्र की ख्याति को भी नुक़सान पहुँचता है। डॉ. हक़ का विचार था कि यदि ईमानदारी, सच्चाई और आपसी एकता को बढ़ावा दिया जाए तो हमारी सामाजिक और धार्मिक संस्थाएँ समाज में कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। उनकी यह बातचीत दरअसल एक ऐसे संवेदनशील इंसान के दिल की आवाज़ थी, जो अपने समाज को विकास, एकता और जनसेवा के मार्ग पर अग्रसर देखना चाहता है।

लीड्स में प्रवास के दौरान पाकिस्तानी और बांग्लादेशी समुदायों के इलाक़ों में जाने का भी संयोग हुआ। यह दृश्य मेरे लिए बेहद पसंदीदा और खुशी का कारण था कि उपमहाद्वीप से ताल्लुक़ रखने वाले ये लोग अपनी मेहनत, ईमानदारी और सामाजिक मूल्यों के बल पर न केवल ब्रिटेन के समाज में एक सम्मानजनक स्थान हासिल कर चुके हैं, बल्कि अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक परंपराओं को भी बड़ी खूबसूरती से बनाए हुए हैं। बाज़ारों में उर्दू और बांग्ला भाषा की मिठास सुनाई देती थी, हलाल मांस की दुकानें, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी रेस्तराँ, मस्जिदें, कपड़ों की दुकानें और एशियाई खाद्य-पेय पदार्थों से सजी सुपरमार्केट ऐसा महसूस कराती थीं मानो परदेस में अपने वतन की एक झलक मौजूद हो। सबसे ज़्यादा खुशी इस बात की हुई कि समुदाय के लोग शांतिपूर्ण, संपन्न और प्रतिष्ठित ज़िंदगी जी रहे हैं। उनके बच्चों को शिक्षा के बेहतरीन अवसर मिले हैं, नई पीढ़ी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही है और बुज़ुर्ग अपनी संस्कृति और धार्मिक पहचान को संभाले हुए हैं। यह दृश्य इस सच्चाई का जीता-जागता सबूत था कि मेहनत, शिक्षा और कानून की पालन-पाली इंसान को दुनिया के किसी भी कोने में सम्मान और सफलता से हमकनार कर सकती है।

कुछ सफर नक़्शे पर तय होते हैं और कुछ दिल के अंदर। मंज़िल तक पहुँचना तो हर मुसाफ़िर का नसीब होता है, मगर यादगार सफर वही बनता है जो रास्तों, नज़ारों और इंसानों को दिल में हमेशा के लिए बसा ले। यॉर्कशायर, लीड्स और मेनस्टोन की यह छोटी सी यात्रा भी मेरे लिए ऐसा ही एक अनुभव थी। ट्रेन की खिड़की से गुज़रते हरे-भरे मैदान, ख़ामोश गाँव, आसमान से बातें करते पेड़, सुहावना मौसम, ईमानदार दोस्तों की संगत और ज्ञान व स्नेह से भरी बातचीत ने हर पल को एक नई ताज़गी दी। ऐसा महसूस होता था मानो हम सिर्फ मीलों का सफर नहीं कर रहे, बल्कि यादों की एक ऐसी शाहराह पर क़दम बढ़ा रहे हैं जहाँ हर मोड़ पर एक नई कहानी हमारा इंतज़ार कर रही हो।

लंदन वापसी के समय दिल यही सोचता रहा कि ज़िंदगी में कुछ सफर अपनी अवधि के लिहाज़ से छोटे होते हैं, मगर उनकी यादें उम्र भर इंसान का साथ देती हैं। यॉर्कशायर की हरी-भरी वादियाँ, लीड्स की रौनक़, मेनस्टोन की ख़ामोश खूबसूरती, होटल हेलोन का शांत वातावरण, गोल्फ़ ग्राउंड की शामें, दोस्तों की बेफ़िक्र महफ़िलें और डॉ. ख़ंदेकर अबू हुसैन व डॉ. एम.एन. हक़ की स्नेहमयी मेज़बानी हमेशा दिल में ज़िंदा रहेगी। यही खूबसूरत यादें ज़िंदगी का वह कीमती सरमाया हैं जो समय गुज़रने के साथ और अधिक कीमती होती चली जाती हैं।

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