अमन के दुशमन कौन?
अमन के दुशमन कौन?

फहीम अखतर लंदन
दुनिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ युद्ध और शांति के बीच का फासला बहुत कम रह गया है। हालिया राजनयिक प्रयास, जिनमें अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत शामिल थी, स्पष्ट रूप से विफल हो गए हैं। हालांकि दशकों बाद संवाद शुरू होना एक सकारात्मक कदम था, लेकिन इसकी विफलता ने कई खतरनाक सवाल पैदा कर दिए हैं।
हकीकत यह है कि 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सीधा संपर्क लगभग खत्म हो गया था। ऐसे में विश्वास की कमी एक स्वाभाविक बात थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विफलता वाकई अपरिहार्य थी या इसे जानबूझकर विफल बनाया गया? ईरान ने वार्ता से पहले अपनी कुछ स्पष्ट ‘रेड लाइन्स’ तय की थीं, जिनमें होर्मुज जलडमरूमध्य की संप्रभुता, युद्ध के नुकसान की भरपाई, जमी हुई संपत्ति की वापसी और क्षेत्र में युद्धविराम शामिल थे। गौर करने वाली बात यह है कि परमाणु मुद्दा इस सूची में शीर्ष पर नहीं था, जो इस बात का संकेत है कि ईरान लचीलापन दिखाने के लिए तैयार था। इसके विपरीत, अमेरिका का रवैया सशर्त और एकतरफा मांगों पर आधारित दिखाई देता है। वैसे अमेरिका न तो बिना शर्त आर्थिक प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार था और न ही युद्ध के नुकसान की भरपाई पर। इसके अलावा, उसने इजरायल की नीतियों से खुद को अलग रखने का बहाना बनाकर वास्तव में उसकी निरंतर सैन्य कार्रवाइयों को औचित्य प्रदान किया।
यहाँ इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। लेबनान में जारी कार्रवाइयां, बावजूद इसके कि ईरान इसे अपनी ‘रेड लाइन’ घोषित कर चुका था, किसी भी गंभीर राजनयिक प्रक्रिया को बाधित करने के समान थीं। ऐसा महसूस होता है कि क्षेत्र में तनाव बनाए रखना ही एक रणनीति बन चुकी है। इस पूरी स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान आम इंसान का है। यदि तनाव बढ़ता है, तो इसके प्रभाव केवल ईरान या इजरायल तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरा क्षेत्र और वास्तव में पूरी दुनिया इसकी चपेट में आ सकती है। तेल की आपूर्ति, वैश्विक अर्थव्यवस्था और खाद्य आपूर्ति सब प्रभावित होंगे। अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता अतीत में कड़े और विवादास्पद बयान दे चुके हैं, जो किसी भी संकट को और भड़का सकते हैं। इसी तरह ब्रिटेन में कंजर्वेटिव लीडर केमी बेडनोक के बयान इस बात को दर्शाते हैं कि युद्ध के खर्चों का बोझ एक बार फिर आम नागरिकों पर डालने की तैयारी हो रही है। जबकि हकीकत यह है कि युद्ध कभी भी स्थायी समाधान प्रदान नहीं करते। हर युद्ध का अंत अंततः बातचीत ही होता है। लेकिन अगर बातचीत को गंभीरता से न लिया जाए और उन्हें राजनीतिक हितों की भेंट चढ़ा दिया जाए, तो शांति महज एक सपना बनकर रह जाती है।
आज दुनिया को जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है वास्तविक नियत के साथ बातचीत, आपसी सम्मान और ताकत के बजाय न्याय पर आधारित फैसले। अगर अमेरिका और इजरायल अपनी नीतियों पर पुनर्विचार नहीं करते, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि वे खुद ही शांति की राह में सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं। मध्य पूर्व एक बार फिर एक ऐसे टकराव की चपेट में है जहाँ बंदूकों की गूँज तो सुनाई देती है, लेकिन अंजाम धुंध में छिपा हुआ है। अमेरिका और इजरायल की ओर से शुरू की गई सैन्य कार्रवाइयां स्पष्ट रूप से शक्ति प्रदर्शन जरूर हैं, लेकिन गहराई से देखा जाए तो यह एक ऐसे रणनीतिक संकट की ओर इशारा करती हैं जिसमें ‘जीत’ की कोई स्पष्ट परिभाषा मौजूद नहीं है।
असममित युद्धों (Asymmetric wars) में सफलता का पैमाना युद्ध के मैदान में हासिल की गई अस्थायी बढ़त नहीं होता, बल्कि यह होता है कि क्या एक पक्ष अपने प्रतिद्वंद्वी को अपनी राजनीतिक शर्तें मानने पर मजबूर कर पाता है या नहीं। इसी पैमाने पर यदि मौजूदा स्थिति का जायजा लिया जाए तो यह कहना मुश्किल नहीं कि सैन्य सफलताएं अभी तक राजनीतिक परिणामों में तब्दील नहीं हो सकी हैं। ईरान की रणनीति अपेक्षाकृत सरल लेकिन प्रभावी दिखाई देती है—जो कि ‘अस्तित्व ही सफलता है’। जब एक राष्ट्र अपने बुनियादी ढांचे, क्षेत्रीय प्रभाव और राजनीतिक व्यवस्था को बनाए रख लेता है, तो वह वास्तव में उस दबाव को विफल कर देता है जो उस पर डाला जा रहा होता है। इसके विपरीत, अमेरिका और इजरायल के लक्ष्य न केवल व्यापक बल्कि अस्पष्ट भी दिखाई देते हैं। क्या उद्देश्य ईरान की नीति बदलवाना है? उसकी क्षेत्रीय शक्ति को सीमित करना है? या पूर्ण आत्मसमर्पण पर मजबूर करना? जब लक्ष्य स्पष्ट न हों तो सफलता भी मापने योग्य नहीं रहती। यही वह बिंदु है जहाँ इस युद्ध की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है।
कई हफ्तों से जारी इस तनाव ने पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है, लेकिन इसके बावजूद कोई निर्णायक प्रगति नजर नहीं आती। इसकी मुख्य वजह यह है कि तीनों पक्ष—अमेरिका, इजरायल और ईरान—इस संघर्ष के अंत के बारे में बिल्कुल अलग धारणाएं रखते हैं। एक पक्ष दबाव के जरिए परिणाम चाहता है, जबकि दूसरा महज उस दबाव को झेलकर उसे बेअसर करने की कोशिश कर रहा है। इतिहास हमें बताता है कि ऐसी स्थिति अक्सर लंबे संघर्षों को जन्म देती है, जहाँ तात्कालिक सैन्य सफलताएं अंततः रणनीतिक विफलता में बदल जाती हैं। वियतनाम युद्ध और अन्य उदाहरण इस वास्तविकता की याद दिलाते हैं कि ताकत का अंधाधुंध इस्तेमाल हमेशा राजनीतिक सफलता की गारंटी नहीं होता। इस युद्ध में भी एक स्पष्ट विरोधाभास मौजूद है: युद्ध के मैदान में बढ़त हासिल की जा सकती है, लेकिन अगर प्रतिद्वंद्वी अपनी बुनियादी स्थिति से पीछे न हटे, तो यह बढ़त अंततः बेमानी हो जाती है। आज की हकीकत यह है कि यह टकराव एक रणनीतिक गतिरोध का शिकार हो चुका है। और गतिरोध हमेशा खतरनाक होता है क्योंकि इसमें पक्ष अक्सर अपनी विफलता स्वीकार करने के बजाय टकराव को और विस्तार देते हैं। अगर यही रवैया जारी रहा, तो यह युद्ध न केवल क्षेत्र बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए भी एक दीर्घकालिक खतरा बन सकता है।
अमेरिका की दादागिरी और इजरायल के खूनी पंजों से पश्चिमी एशिया एक बार फिर ऐसी आग में जल रहा है जिसकी तपिश केवल इस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी। पिछले दो वर्षों में अमेरिका और इजरायल के गठजोड़ ने क्षेत्र को निरंतर तनाव, रक्तपात और अस्थिरता की ओर धकेला है। इस नीति का परिणाम केवल युद्ध के मोर्चों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने मानव जीवन, अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया है। अब ईरान इस बढ़ती खींचतान का केंद्र बनता जा रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह टकराव किसी स्पष्ट अंजाम की ओर बढ़ रहा है, या महज ताकत के प्रदर्शन की एक न खत्म होने वाली जंजीर बन चुका है?
इतिहास गवाह है कि जब भी ताकत, श्रेष्ठता और वर्चस्व के सिद्धांतों ने जन्म लिया, उन्होंने दुनिया को तबाही के मुहाने पर ला खड़ा किया। द्वितीय विश्व युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ सैन्यवाद और प्रभुत्व की विचारधारा ने करोड़ों इंसानों को निगल लिया। इस युद्ध के बाद दुनिया ने यह संकल्प लिया था कि ऐसी विचारधाराओं को दोबारा पनपने नहीं दिया जाएगा। मगर आज के हालात इस वादे पर सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं। मौजूदा स्थिति में ताकत का असंतुलित उपयोग, संप्रभुता को चुनौती देना और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सैन्य दबाव बढ़ाना एक खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत है। यह महज एक क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच का प्रतिबिंब है जो ताकत को हक पर प्राथमिकता देती है। हालांकि, एक हकीकत स्पष्ट है: युद्ध अस्थायी बढ़त तो दे सकते हैं, लेकिन वे स्थायी समाधान कभी प्रदान नहीं करते। अगर कोई पक्ष यह समझता है कि निरंतर दबाव और ताकत के इस्तेमाल से वह अपने राजनीतिक उद्देश्य प्राप्त कर लेगा, तो इतिहास बार-बार यह साबित कर चुका है कि यह एक गलतफहमी है।
आज दुनिया को एक बार फिर एक निर्णायक मोड़ का सामना है। या तो अतीत की गलतियों से सबक सीखा जाए, या फिर उन्हीं रास्तों पर चलकर एक और लंबे और विनाशकारी संकट को दावत दी जाए। शांति का रास्ता ताकत के इस्तेमाल से नहीं, बल्कि न्याय, संवाद और आपसी सम्मान से निकलता है। अगर ये सिद्धांत नजरअंदाज किए गए, तो यह आग केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकती है। तो सवाल यह है कि शांति का दुश्मन कौन है? क्या वे राज्य हैं जो ताकत के बल पर अपनी शर्तें थोपना चाहते हैं, या वे नीतियां जो संवाद के दरवाजे बंद करके टकराव को बढ़ावा देती हैं?
जब अमेरिका और इजरायल जैसे शक्तिशाली पक्ष सैन्य दबाव को कूटनीति पर प्राथमिकता देते हैं, और ईरान जैसे देश इसे अपने अस्तित्व की लड़ाई समझते हैं, तो शांति सबसे पहले कुर्बान होती है। हकीकत यह है कि शांति का दुश्मन कोई एक देश नहीं, बल्कि वह रवैया है जो ताकत को अधिकार समझता है, मतभेद को दुश्मनी में बदल देता है और न्याय के बजाय वर्चस्व को प्राथमिकता देता है। जब तक यह सोच नहीं बदलती, शांति केवल एक इच्छा रहेगी, हकीकत नहीं।

