"क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है”

"क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है"

– फ़हीम अख़्तर, लंदन

मुहर्रम का अत्यंत बरकत वाला महीना अल्लाह तआला के बताए गए चार पवित्र महीनों में से एक है और इसकी विशेष महत्ता है। अल्लाह तआला ने इसे साल के चार पवित्र महीनों में से एक ठहराया है। हालाँकि बहुत से मुसलमान इसे पैगंबर-ए-इस्लाम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नवासों की याद में मनाते हैं।
चूँकि यह महीना एक पवित्र महीना है, इसलिए बहुत से मुसलमान अपनी इबादत बढ़ाने के लिए मुहर्रम के दौरान रोज़े भी रखते हैं। आशूरा के रोज़े का रिवाज़ इस्लाम के उदय से पहले भी था। हिजरत के समय जब रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मदीना तशरीफ़ लाए, तो यहूदी आशूरा का रोज़ा रख रहे थे और कहने लगे: "यह वह दिन है जब मूसा (अलैहिस्सलाम) ने फिरौन पर विजय पाई।”
इस पर रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सहाबा-ए-किराम (रज़ियल्लाहु अन्हुम) से फरमाया: "तुम (मुसलमान) मूसा की विजय का जश्न मनाने का उनसे अधिक हक़ रखते हो, इसलिए इस दिन रोज़ा रखो।” (सहीह बुख़ारी: 4680)।

मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का एक महत्त्वपूर्ण महीना है। मुहर्रम हिजरी कैलेंडर का वह महीना है जिससे इस्लामी साल की शुरुआत होती है। इस महीने में कई महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई हैं। इसी महीने में फिरौन डूबा था। अबराहा के लश्कर (अस्हाब-ए-फ़ील) पर अज़ाब आया था। शिअब-ए-अबी तालिब में घिरने की शुरुआत हुई थी। ग़ज़वा-ए-ज़ात-उर-रिक़ा और ग़ज़वा-ए-ख़ैबर हुआ था। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का हज़रत सफ़िय्या (रज़ियल्लाहु अन्हा) से निकाह हुआ था। रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ओर से विभिन्न बादशाहों और सरदारों को दावत के ख़ुतूत भेजे गए थे। जंग-ए-क़ादिसिया लड़ी गई थी। हज़रत मारिया क़िब्तिय्या (रज़ियल्लाहु अन्हा) का इंतक़ाल हुआ था। हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हा) की ख़िलाफ़त की शुरुआत हुई थी। हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हा) क़ातिलाना हमलों के बाद ज़ख़्मों की ताब न लाते हुए शहीद हो गए थे। वाक़िया-ए-करबला और हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हा) की शहादत हुई थी।
इन सभी महत्वपूर्ण घटनाओं के बावजूद आज भी दुनिया के सभी मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं और अपने-अपने ढंग से ग़म और ग़ुस्से का इज़हार करते हैं। ख़ासकर हिंदुस्तान और पाकिस्तान में शियाओं के अलावा सुन्नी हज़रात भी इमाम हुसैन की शहादत को बड़े इज़्ज़त और एहतिराम के साथ मनाते हैं। हालाँकि ईरान, इराक़ और अन्य देशों में जहाँ शिया मत के मानने वालों की संख्या अधिक है, वहाँ मुहर्रम काफ़ी जोश-ओ-ख़रोश से मनाया जाता है। ब्रिटेन में भी शिया मत से संबंध रखने वाले लोग अपने-अपने इलाकों में इमामबाड़े और घरों में मजालिस का आयोजन करते हैं। इसके अलावा कई इलाकों में मुहर्रम का जुलूस भी निकाला जाता है।

हज़रत इमाम हुसैन का जन्म 3 शाबान, 4 हिजरी को मदीना में हुआ था। हज़रत इमाम हुसैन के पिता का नाम हज़रत अली इब्ने अबी तालिब और माता का नाम हज़रत फ़ातिमा ज़हरा है। हज़रत इमाम हुसैन, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नवासे थे। हज़रत इमाम हुसैन सच्चाई के मामले में नाना जान के सच्चे वारिस थे। हज़रत इमाम हुसैन की शहादत केवल इस बात के लिए हुई कि उन्होंने झूठ, मक्कारी, दग़ाबाज़ी, शराबी, ज़ालिम के सामने झुकने से इनकार कर दिया था।
हज़रत मुआविया के इंतक़ाल के बाद यज़ीद ने ख़ुद अपनी ख़िलाफ़त का ऐलान कर दिया। यज़ीद को आयाशी के अलावा शराब, औरत, गाने-बजाने जैसी चीज़ों से काफ़ी दिलचस्पी थी। ऐतिहासिक दृष्टि से यज़ीद हमेशा शराब के नशे में धुत रहता था। अरबों में यज़ीद के ख़िलाफ़ काफ़ी ग़म और ग़ुस्सा था, लेकिन यज़ीदी ज़ुल्म-ओ-जब्र की वजह से कोई उसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाता था।
इसके विपरीत हज़रत इमाम हुसैन को यज़ीद से कोई डर नहीं था। हमेशा उन्होंने सच का साथ दिया और सच्चाई के समर्थन में आवाज़ उठाई। इस विशेष गुण यानी हक़गोई और सच्चाई के ज़रिए उन्होंने लोगों में इस्लाम और इस्लामी आदेशों के प्रति जागरूकता पैदा की, ताकि लोगों का ईमान और मज़बूत हो। हज़रत इमाम हुसैन ने अलानिया तौर पर यज़ीद की ख़िलाफ़त को मानने और बैअत करने से इनकार कर दिया।
हज़रत इमाम हुसैन ने यज़ीद की बदअख़्लाक़ी और आयाशी की वजह से उसे ख़लीफ़ा मानने से इनकार किया। हज़रत इमाम हुसैन ने लोगों से कहा कि इस्लाम में बदअख़्लाक़ी और आयाशी करने वालों के लिए कोई जगह नहीं है।

यज़ीद अपनी ताक़त के नशे में चूर था और उसे इस्लाम के अक़ीदों और महत्ता की परवाह नहीं थी। वह धार्मिक बातों से हटकर शराब और आयाशी में अपना वक़्त गुज़ारता था। यज़ीद को हज़रत इमाम हुसैन की बात से काफ़ी तकलीफ़ पहुँची और उसने जंग करने का फ़ैसला कर लिया।
यज़ीद के पास 33,000 सिपाहियों पर मश्तमिल फ़ौज थी, जबकि हज़रत इमाम हुसैन के साथ केवल 72 लोग थे, जिनमें उनके ख़ानदान के लोग भी शामिल थे। इराक़ के करबला शहर में 10 अक्टूबर 680 को यज़ीद और हज़रत इमाम हुसैन के बीच हक़ और बातिल की जंग हुई, जिसमें हज़रत इमाम हुसैन समेत उनके ख़ानदान और साथियों को बेरहमी से शहीद कर दिया गया।
हज़रत इमाम हुसैन शहीद कर दिए गए, लेकिन उन्होंने यज़ीद से न तो रहम की अपील की और न ही यज़ीद के सामने घुटने टेके।

अक्सर देखा गया है कि मुहर्रम का महीना आते ही लोगों में बहस छिड़ जाती है कि इस महीने में ग़म का इज़हार इस तरह नहीं करना चाहिए जैसा लोग करते हैं। ज़ाहिर सी बात है कि हर व्यक्ति अपने फ़िरक़े और ग्रुप की रहनुमाई और प्रभाविता पर अपनी राय रखता है, जो कि एक समझदारी भरा क़दम है। लेकिन वहीं कुछ लोग इस मामले में हद से तजावुज़ भी करने लगते हैं, जिससे ख़्वाह-मख़्वाह माहौल में तनाव पैदा हो जाता है और हम सब हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की महत्ता को भूलकर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने में मशग़ूल हो जाते हैं। हालाँकि कुछ पल के लिए इन बहसों से हमें गुरेज़ करना चाहिए और इत्तिहाद का बेहतरीन नमूना पेश करना चाहिए।
हर साल मुहर्रम में सोशल मीडिया पर कुछ बयानात और रिपोर्ट नज़र से गुज़रती हैं, जिन्हें पढ़कर काफ़ी मायूसी होती है। कई उलमा ने तो मुहर्रम के दौरान उन लोगों को डाँटा जो अखाड़ा और ताज़िया का इंतज़ाम करते हैं, और उन्हें यज़ीद का हामी बना देते हैं। ऐसी बातों से हमारे माहौल में बदमज़गी पैदा होती है और लोग फ़िरक़ों में उलझकर गुमराह हो जाते हैं। हालाँकि उलमा-ए-दीन इन नुक़ात पर इत्मीनान से बात करते हुए इस्लामी अक़ीदों और रवादारी के साथ शाइस्तगी का भरपूर मुज़ाहिरा कर सकते हैं।

मुहर्रम का महीना और हज़रत इमाम हुसैन की शहादत को हर साल याद करना उतना ही ज़रूरी है, जितना कि मज़हब-ए-इस्लाम और दूसरे फ़राइज़ को याद रखना हम ज़रूरी समझते हैं। करबला का वाक़िया हमें यह याद दिलाता है कि हम हक़ और बातिल के लिए किसी भी प्रकार का समझौता नहीं कर सकते। मगर अफ़सोस इस बात का है कि कुछ लोग हर साल मुहर्रम तो मनाते हैं, लेकिन ईमान की पुख़्तगी में दर्स-ए-करबला भूल जाते हैं। वरना ख़ानदान, पड़ोसी, कारोबार, सरकार, मज़हबी मामलात के अलावा हज़ारों ऐसे मसाइल हैं, जहाँ ‘हक़ और बातिल’ को सामने रखकर हर मसले का हल निकाला जा सकता है। अगर आप थोड़ी देर के लिए अपने आस-पास नज़र दौड़ाएँ तो एहसास होगा कि हम कितने कमज़ोर हो चुके हैं। कमज़ोरी और बुज़दिली ने हमें अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और ज़ुल्म-ओ-जब्र करने वालों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत तक छीन ली है। अफ़सोस यह है कि हम तमीज़ भूलकर लब-कुशाई के बजाय मुँह छिपाने का काम करते हैं।

करबला की तारीख़ को पढ़कर और सुनकर आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं। यज़ीद ने जिस बेरहमी से हज़रत इमाम हुसैन और उनके ख़ानदान वालों को शहीद किया था, वह रहती दुनिया तक एक बेमिसाल शहादत कहलाएगी।
लेकिन हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नवासे और उनके ख़ानदान वालों ने करबला में जाम-ए-शहादत पीकर हम गुनहगारों को यह सबक़ दिया है कि जब ‘हक़ और बातिल’ की बात हो तो कभी ख़ामोश न बैठो और इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाओ।
मुजाहिद-ए-आज़ादी और क़ौम-ओ-मिल्लत के रहनुमा मौलाना मुहम्मद अली जौहर ने क्या ख़ूब कहा है:

"क़त्ल-ए-हुसैन अस्ल में मर्ग-ए-यज़ीद है”
"इस्लाम ज़िंदा होता है हर करबला के बाद”

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