एक और पत्रकार अमल खलील की हत्या
एक और पत्रकार अमल खलील की हत्या
एक और पत्रकार अमल खलील की हत्या

लेख: फहीम अख्तर
आज के दौर में पत्रकारिता, जो कभी सच्चाई की आवाज़ और जन जागरूकता का आधार मानी जाती थी, खुद एक खतरनाक पेशा बनती जा रही है। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पत्रकार या तो अपनी जान गंवा रहे हैं या उन्हें जेल की सलाखों और प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या सच बोलना इतना बड़ा अपराध बन चुका है कि इसकी कीमत जीवन या स्वतंत्रता के रूप में चुकानी पड़े?
हालिया घटनाएं इस कड़वी सच्चाई को दर्शाती हैं कि युद्ध क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकार सबसे अधिक असुरक्षित हो गए हैं। दक्षिण लेबनान में एक पत्रकार की मौत और दूसरे के घायल होने की घटना इसी कड़ी का एक हिस्सा है। ऐसी घटनाएं केवल दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं जहां सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जा रहा है।
सच्चाई की कीमत: एक खतरनाक मिशन
युद्ध की स्थिति में पत्रकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि वे जमीनी हकीकत को दुनिया के सामने लाते हैं। लेकिन यही भूमिका उन्हें शक्तिशाली हलकों के लिए खतरा बना देती है।
जब पत्रकार बमबारी, नागरिक हताहतों या मानवाधिकारों के उल्लंघन को उजागर करते हैं, तो वे उन आख्यानों (narratives) को चुनौती देते हैं जिन्हें राज्य या सैन्य ताकतें पेश करना चाहती हैं।
परिणामस्वरूप, उन्हें खामोश करने की कोशिश की जाती है—कभी सीधे हमलों के माध्यम से, तो कभी कानूनी या राजनीतिक दबाव के माध्यम से।
‘डबल टैप‘ हमलों जैसी घटनाएं, जहां एक ही स्थान को बार-बार निशाना बनाया जाता है, न केवल आम नागरिकों बल्कि सहायता कर्मियों और पत्रकारों के लिए भी गंभीर खतरा बन जाती हैं। इस तरह के हमले अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून की भावना के खिलाफ हैं, क्योंकि ये उन लोगों को निशाना बनाते हैं जो पहले से ही घायलों की मदद या तथ्यों की रिपोर्टिंग में व्यस्त होते हैं।
अमल खलील की हत्या: एक त्रासदी
इजरायल और लेबनान के बीच युद्धविराम के बावजूद, बुधवार 22 अप्रैल को इजरायली सेना ने प्रमुख लेबनानी पत्रकार अमल खलील की हत्या कर दी।
घटना: अमल खलील और उनकी साथी फोटोग्राफर ज़ैनब फराज दक्षिण लेबनान से रिपोर्टिंग कर रही थीं, तभी एक इजरायली ड्रोन ने उनके पास एक कार को निशाना बनाया।
हमला: उन्होंने एक नजदीकी इमारत में शरण ली, लेकिन इजरायल ने उस इमारत को भी निशाना बनाया।
सहायता में बाधा: इजरायली सेना ने चिकित्सा कर्मियों को छह घंटे से अधिक समय तक घटनास्थल पर जाने से रोका। जब अमल का शव मलबे से निकाला गया, तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी।
‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (CPJ) की क्षेत्रीय निदेशक सारा कद्दा का कहना है कि "जानबूझकर बाधा डालना एक युद्ध अपराध है और इसकी अंतरराष्ट्रीय जांच की आवश्यकता है।”
धमकियां और निशाना बनाना
अमल खलील को पहले भी इजरायली नंबरों से सीधे धमकियां मिली थीं। उन्हें चेतावनी दी गई थी कि अगर वह अपनी जान चाहती हैं, तो लेबनान छोड़ दें या रिपोर्टिंग बंद कर दें। अमल ने अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से इजरायली दावों को नकारा था और दिखाया था कि कैसे नागरिक घरों और बच्चों को निशाना बनाया जा रहा है।
वैश्विक समुदाय का दोहरा मापदंड
यह एक कड़वी सच्चाई है कि पत्रकारों की हत्याओं को वैश्विक स्तर पर समान महत्व नहीं दिया जाता है।
अगर यही घटनाएं किसी पश्चिमी देश में होती हैं, तो प्रतिक्रिया कहीं अधिक तीव्र और तत्काल होती है।
लेकिन जब यह सब मध्य पूर्व में होता है, तो इसे अक्सर "संघर्ष का हिस्सा” मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
यह स्थिति इस बात की भी ओर इशारा करती है कि वैश्विक स्तर पर पत्रकारों की सुरक्षा के लिए मौजूद कानून अपनी प्रभावशीलता खो रहे हैं। जवाबदेही की कमी ने यह संदेश दिया है कि पत्रकारों के खिलाफ अपराध बिना किसी परिणाम के जारी रखे जा सकते हैं।
इन सभी स्थितियों का सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है। जब पत्रकारों को खामोश कर दिया जाता है, तो सच्चाई भी दब जाती है। जनता को अधूरी या विकृत जानकारी मिलती है, जिससे न केवल उनकी जागरूकता प्रभावित होती है बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी कमजोर होती है।
सवाल यह है: यदि सच बोलने वाले सुरक्षित नहीं हैं, तो क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र दुनिया में रह रहे हैं?
पत्रकारिता को समाज का विवेक कहा जाता है, लेकिन जब यही विवेक खामोश होने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। अमल खलील की हत्या सिर्फ एक पत्रकार की मौत नहीं, बल्कि सच्चाई की आवाज़ पर एक और हमला है।

