पाखंड या मजबूरी?
लेखक: फहीम अख्तर, लंदन

मानव इतिहास में पाखंड हमेशा से एक ऐसा व्यवहार रहा है जिसने समाजों को नुकसान पहुँचाया, विश्वास को आहत किया और सिद्धांतों व मूल्यों को कमजोर किया। पाखंड की सरल परिभाषा यह है कि इंसान जुबान से कुछ और कहे, कर्म में कुछ और करे, या परिस्थितियों और स्वार्थों के अनुसार अपने सिद्धांत बदलता रहे।

पाखंडी व्यक्ति या समूह के निकट हक और बातिल का मापदंड सिद्धांत नहीं बल्कि फायदा होता है। जब स्वार्थ एक तरफ हो तो एक मोर्चा अपनाया जाता है और जब स्वार्थ दूसरी तरफ नजर आए तो वही लोग अपने पिछले बयानों और दावों को भूल जाते हैं। इतिहास में ऐसी अनगिनत मिसालें मिलती हैं। राजनीतिक इतिहास का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि बहुत से शासक और राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए एक नारा बुलंद करते हैं और सत्ता मिलने के बाद उसी नारे के विपरीत कदम उठाते हैं। उपमहाद्वीप की राजनीति में भी हमने कई बार देखा कि जिन शख्सियतों को एक दौर में गद्दार, बागी या कौम दुश्मन करार दिया गया, बाद में उन्हीं के साथ गठबंधन कर लिया गया और उनकी तारीफों के पुल बांधे गए। यह व्यवहार सिर्फ किसी एक देश या दल तक सीमित नहीं बल्कि दुनिया भर की राजनीति में समय-समय पर नजर आता है।

इसी परिप्रेक्ष्य में पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध राजनीतिक नेता हुमायूँ कबीर का मामला भी गौरतलब है। कुछ समय पहले जब हुमायूँ कबीर ने एक मस्जिद के निर्माण का ऐलान किया जिसे ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम से संबोधित किया जा रहा था, तो उस समय राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के कई नेताओं ने कड़े एतराज़ उठाए। उन पर आरोप लगाया गया कि वह धार्मिक भावनाओं को भड़का रहे हैं, राजनीतिक फायदा हासिल करना चाहते हैं और ऐसे कदमों से सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है। विभिन्न बयानों में उन्हें निशाने पर लाया गया और कुछ हलकों ने उनके कदम को अनुचित ठहराते हुए कड़ी जुबान इस्तेमाल की। लेकिन राजनीति के बदलते मौसम शायद सिद्धांतों से अधिक ताकतवर होते हैं। आज जब हुमायूँ कबीर को कोलकाता की प्रसिद्ध राष्ट्रीय फुटबॉल टीम मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब का अध्यक्ष चुना गया है, तो वही राजनीतिक हलके और शख्सियतें मुबारकबाद पेश करते नजर आ रहे हैं जो कल तक उनकी आलोचना कर रहे थे।

सवाल यह है कि क्या हुमायूँ कबीर बदल गए हैं? क्या उनके विचारों या उनकी शख्सियत में कोई बुनियादी बदलाव आ गया है? यदि नहीं, तो फिर व्यवहार की इस बदलाव को क्या नाम दिया जाए? सिद्धांतपरस्ती, राजनीतिक मसलहत, या फिर खुला पाखंड?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आम मुस्लिम मतदाता और जनता अक्सर राजनीतिक बयानों को सच समझकर स्वीकार कर लेते हैं। जब कोई नेता किसी शख्सियत को इस्लाम, मुसलमानों या समाज के लिए खतरा करार देता है तो लोग उस बात को गंभीरता से लेते हैं। लेकिन जब कुछ महीने बाद वही नेता उसी शख्सियत के साथ तस्वीर खिंचवाता, उसे मुबारकबाद देता और उसके साथ राजनीतिक या सामाजिक संबंध स्थापित करता नजर आता है तो जनता के दिमाग में स्वाभाविक रूप से शक पैदा होते हैं।

इससे अधिक अफसोसनाक पहलू यह है कि कुछ ऐसे मुस्लिम नामी नेता भी इस व्यवहार का हिस्सा बन जाते हैं जिनसे बंगाल के मुसलमान बड़ी उम्मीदें वाबस्ता करते हैं। यह लोग बज़ाहिर मुसलमानों के अधिकारों, धार्मिक तशख्खुस और मसलों की बात करते हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से अक्सर उनकी प्राथमिकताएँ निजी स्वार्थों, राजनीतिक पदों या वक्ती फायदों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य का सवाल दरपेश हो तो वह खामोशी इख्तियार कर लेते हैं, और जब उन्हें जनता का समर्थन दरकार हो तो धार्मिक भावनाओं को उभारने लगते हैं।

मुसलमानों के लिए फिक्र का मौका है कि आखिर कब तक वह भावनात्मक नारों, धार्मिक जज्बातों के नाम पर की जाने वाली राजनीति और अवसरवादी कयादत के झांसे में आते रहेंगे? हर चुनाव के मौके पर मुसलमानों को बड़े-बड़े वादे सुनाए जाते हैं। उन्हें बताया जाता है कि फलाँ नेता उनका मुहाफिज है, फलाँ पार्टी उनकी इकलौती प्रतिनिधि है और फलाँ शख्सियत उनके मसले हल कर सकती है। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद अक्सर यही वादे फाइलों, बयानों और तकरीरों में दफन हो जाते हैं।

भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में एक लंबे अरसे से कुछ मुस्लिम नामी नेता खुद को मुसलमानों का प्रतिनिधि, मुहाफिज और प्रवक्ता बनाकर पेश करते रहे हैं। हर चुनाव से पहले यह लोग मुसलमानों के धार्मिक जज्बातों, पहचान और सुरक्षा के मसलों को उभारते हैं, भावनात्मक तकरीरें करते हैं और यह तस्सुर देते हैं कि वही कौम के हकीकी खैरख्वाह हैं। लेकिन जब चुनाव खत्म हो जाते हैं तो मुसलमानों की तालीम, रोजगार, माशी पसमानदगी, राजनीतिक नुमाइंदगी और सामाजिक मसले पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। अफसोस की बात यह है कि जो नेता मुसलमानों के वोट और भरोसे के जरिये राजनीतिक मुकाम हासिल करते हैं, उन्हीं से सवाल करने की जुर्रत बहुत कम लोग करते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि मुसलमानों के एक तबके में यह डर पैदा कर दिया गया है कि अगर इन नाम निहाद मुस्लिम नेताओं पर आलोचना की गई तो उसका फायदा विपक्षी राजनीतिक ताकतों को पहुँचेगा। यही सोच इन नेताओं को एहतेसाब से बचाती है और उन्हें अपनी सियासत जारी रखने का मौका प्रदान करती है।

असल सवाल यह नहीं कि मुसलमान हक और बातिल को भूल गया है, बल्कि सवाल यह है कि क्या मुसलमान ने हक बात कहने और अपने ही हलके के गलत करदारों का एहतेसाब करने की आदत खो दी है? इस्लाम की तालीम यह नहीं कि सिर्फ दूसरों की गलतियों पर आवाज बुलंद की जाए और अपने लोगों की खामियों पर खामोशी इख्तियार कर ली जाए। अगर कोई नेता मुसलमानों के नाम पर सियासत करता है, उनके जज्बातों से फायदा उठाता है और फिर उनके मसलों को भूल जाता है तो उससे सवाल करना भी एक दीनी, अखलाकी और जमहूरी जिम्मेदारी है।

कौमों की तरक्की अंधी इताअत से नहीं बल्कि शऊर, एहतेसाब और उसूल परस्ती से होती है। जब तक मुसलमान शख्सियत परस्ती से ऊपर उठकर कारदगी और करदार को मापदंड नहीं बनाएंगे, तब तक कुछ स्वार्थी मुस्लिम नामी नेता उनके जज्बातों का इस्तेमाल करके अपनी राजनीतिक गठरी सीधी करते रहेंगे जबकि आम मुसलमान मसलों के इसी दायरे में घूमता रहेगा।

धोखेबाज और स्वार्थी नेता अच्छी तरह जानते हैं कि मुसलमानों के अंदर जज्बाती वाबस्तगी का तत्व मजबूत है। इसी लिए कभी मजहब के नाम पर, कभी खौफ के नाम पर और कभी तहफ्फुज के नाम पर उनके वोट हासिल किए जाते हैं। जनता की असल जरूरतें, जैसे तालीम, रोजगार, सेहत, सामाजिक तरक्की और माशी इसतेहकाम, अक्सर पृष्ठभूमि में चली जाती हैं। नतीजा यह होता है कि बरसों गुजर जाते हैं मगर आम मुसलमान की जिंदगी में खासी तब्दीली नहीं आती, जबकि राजनीतिक नेताओं के ओहदे, असरो-रुसूख और स्वार्थ बढ़ते चले जाते हैं।

हुमायूँ कबीर के मामले ने एक बार फिर यह सवाल उठा दिया है कि सियासत में उसूल अहम हैं या मफाद? अगर बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिद बनाना वाकई इतना बड़ा जुर्म था तो आज मुबारकबादों का सिलसिला क्यों जारी है? और अगर वह कदम इतना गलत नहीं था जितना उस समय बताया जा रहा था, तो फिर जनता को गुमराह क्यों किया गया? यह सवाल सिर्फ एक व्यक्ति या एक पार्टी से संबंधित नहीं बल्कि पूरी राजनीतिक संस्कृति से जुड़े हुए हैं।

जरूरत इस बात की है कि मुसलमान जज्बातों के बजाय शऊर की बुनियाद पर फैसले करें। किसी भी नेता को सिर्फ उसके नाम, लिबास, धार्मिक नारों या भावनात्मक तकरीरों की बुनियाद पर अपना प्रतिनिधि न मानें। उसके करदार, माजी, कारदगी और जनसेवाओं को देखें। यह जाँचें कि उसने सत्ता या प्रभाव मिलने के बाद अपनी बिरादरी और समाज के लिए क्या व्यावहारिक काम किया है। जो नेता हर मौसम में अपना मोर्का बदल ले, जो कल किसी को बुरा कहे और आज उसी की तारीफ करे, उसके दावों को सावधानी से परखना चाहिए।

मुसलमानों की तरक्की का रास्ता बाशऊर कयादत के चुनाव, तालीम के फरोग, सामाजिक इत्तेहाद और राजनीतिक बसीरत से होकर गुजरता है। अगर कौम अपने नेताओं का चुनाव सोच-समझकर करेगी तो अवसरवादी तत्व अपने आप बेनकाब हो जाएंगे। बगैर ऐसा किए पाखंड और स्वार्थपरस्ती का यह खेल जारी रहेगा और नुकसान हमेशा आम जनता का ही होगा।

वक्त का तकाजा है कि मुसलमान शख्सियत परस्ती के बजाय सिद्धांतपरस्ती को इख्तियार करें, नारों के बजाय प्रदर्शन को मापदंड बनाएं और अपने वोट और भरोसे को एक अमानत समझते हुए ऐसे नेताओं का चुनाव करें जो वाकई कौम की सेवा का जज्बा रखते हों। यही व्यवहार उन्हें राजनीतिक शोषण से बचा सकता है और एक बेहतर भविष्य की बुनियाद भी बन सकता है।

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